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इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निस्संदेह कुछ भी नहीं है. लेखन को साधना मानने वाले मेधावी उपनिषदों के इस भाषा को पूर्ण रूप से चरितार्थ करती है. लिखते तो बहुत हैं पर शायद ही कोई अपने लेखन को स्वयं की खोज का माध्यम बनाता है. मेधावी के द्वारा मृत्यु की मीमांसा पूर्णतया नया आयाम खोलती है. वह शरीर की मृत्यु की नहीं अपितु अंतरात्मा के हनन की बात करती है. इतनी कच्ची उम्र में वह सांसारिक कर्म और लेखन साधना के बीच तारतम्य बनाए रखती है. आत्मानुसंधान में जुटी बाहरी जगत से नाता नहीं तोड़ती. मेधावी में उस कर्म योगी की झलक मिलती है जो जानता है कि कर्म फल से बचने के लिए निष्क्रियता पर आसक्ति सत्य से दूर करती है. उसका यही गुण उसे लोक वासना से दूर रखता है.