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मेधावीजी, मैं आपके आलेख -कविता, जो आपकी भावना का भाषिक रूप है , मैं अधिकांशत: पढता हूँ।किन्तु सब पर कमेंट नहीं कर पाता। अनिर्वचनीय तत्त्व को पदार्थ (भाषा) में प्रकाशित करने का एक कठोर प्रयास को संतुलन देना आपकी कला है। कभी कभी मैं सोचता हूँ कि अंतिम सीढ़ी से एक पायदान पहले बैठ कर आप संतुष्ट रहतीं है तो कभी लगता है दोनों जगत में आपके निर्वाध गमनागमन की स्थिति ही आपको स्वाभाविकता प्रदान की है। आध्यात्मिकता तो सर्व व्यापिनी हैं, इस लिए नहीं कहूँगा की गृहस्थ-सांसारिक जीवन को सार्थक भोग करते हुए इन्द्रियातीत तत्त्वों के दिव्य आनंद में रमण करना कोई कठिन काम है। आप स्वयं ही इसका आदर्श उदाहरण हैं। एक साधक आत्मा सभी स्थितिओं में उस दिव्य आनंद को प्राप्त करते हैं। अव्यक्त जगत का जो रूप देने का प्रयास अपने भाषा में आप करतीं है वह अपने आप ही व्यक्त और अव्यक्त का सेतु बन जाता है। परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ कि आपका आध्यात्मिक उत्तरण निरंतर गतिशील हो, दिव्य आनंद की अनुभूति अक्षय हो।