A poem dedicated to Indian housewives
- medhavig4u
- Mar 20, 2018
- 1 min read
कमाल है, उसकी वजह से घर, घर होता है उस संग जागता, उस संग ही सोता है वह घर के कण-कण में रहती है फर्नीचर, पर्दों, रसोई के बर्तनों में बसती है फिर भी अपने वजूद को सबमें तलाशती है सबकी आँखों में अपने व्यक्तित्व की पुष्टि चाहती है ओ गृहणी आख़िर तू ऐसी क्यों है तू इन सबसे ऊपर स्वयं की एक पहचान बना कुछ ऐसा कर कि तेरी आँखों में तेरे बच्चे अपना वजूद खोजें तेरे जीवन साथी का व्यक्तित्व तुझसे ही पूर्ण हो और तू विनम्र मुस्कान ओढ़े स्वयं को खोजे सबको एक धागे में पिरोए अपनी गृहस्थी की गाड़ी को आगे, निरतंर आगे ले जाए Dedicated to all housewives, including me :-) Love & peace Medhavi




Comments