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साहित्य की मशाल के साथ एक नई शुरुआत : “धर्म फॉर लाइफ हिन्दी साहित्य” का शुभारंभ

  • Writer: medhavig4u
    medhavig4u
  • 1 day ago
  • 5 min read

गुरुग्राम की सांस्कृतिक भूमि पर कल एक अत्यंत महत्वपूर्ण साहित्यिक एवं वैचारिक आयोजन का शुभारंभ हुआ। ट्यूलिप फाउंडेशन की इकाई “धर्म फॉर लाइफ” संस्था ने अपने नवीन स्तंभ “धर्म फॉर लाइफ हिन्दी साहित्य” की औपचारिक शुरुआत एक गरिमामय परिचर्चा के माध्यम से की।


यह आयोजन केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि विचार, संवेदना, संस्कृति और सामाजिक चेतना के समन्वय का ऐसा मंच था, जहाँ साहित्य को जीवन और धर्म के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास किया गया।


 कार्यक्रम का मुख्य विषय था — “साहित्य : धर्म का मर्म, चेतना और परिवर्तन”। यह विषय अपने आप में अत्यंत व्यापक, गंभीर और समकालीन था। आज के समय में जब समाज अनेक प्रकार के वैचारिक द्वंद्वों, सांस्कृतिक संक्रमणों और मानवीय संकटों से गुजर रहा है, तब साहित्य की भूमिका और उसकी सामाजिक उपयोगिता पर विमर्श अत्यंत आवश्यक हो जाता है। इसी उद्देश्य से इस परिचर्चा का आयोजन किया गया, जिसने उपस्थित सभी श्रोताओं, साहित्यप्रेमियों और विद्वानों को गहराई से प्रभावित किया।


 

कार्यक्रम का वातावरण आरंभ से ही आत्मीयता और बौद्धिक ऊष्मा से भरा हुआ था। सभागार में साहित्य और संस्कृति के प्रति अनुराग रखने वाले अनेक बुद्धिजीवी, लेखक, पाठक और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे। सभी के मन में यह उत्सुकता थी कि “धर्म फॉर लाइफ हिन्दी साहित्य” की यह नई पहल भविष्य में किस प्रकार साहित्यिक चेतना को नई दिशा देगी। परिचर्चा में प्रतिष्ठित साहित्यकार और चिंतक उपस्थित थे।

 

वरिष्ठ साहित्यकार लक्ष्मी शंकर वाजपेयी जी ने अपने वक्तव्य में साहित्य और धर्म के अंतर्संबंधों को अत्यंत गहराई से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक अर्थ किसी संकीर्ण परिभाषा में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर मानवीयता, करुणा और नैतिकता के जागरण में निहित है। साहित्य उसी चेतना को जीवित रखने का माध्यम है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि साहित्य समाज को केवल मनोरंजन नहीं देता, बल्कि उसे सोचने, प्रश्न करने और परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देता है।

 

नरेंद्र नागदेव जी ने अपने विचारों में साहित्य की सामाजिक भूमिका को केंद्र में रखा। उन्होंने कहा कि साहित्य समय का दस्तावेज होता है। वह समाज की पीड़ा, संघर्ष, असमानता और आशाओं को शब्द देता है। धर्म यदि मनुष्य को जोड़ने का कार्य करता है, तो साहित्य उन संबंधों को संवेदनशीलता प्रदान करता है। उन्होंने समकालीन साहित्य की चुनौतियों और युवा पीढ़ी की जिम्मेदारियों पर भी महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए।

 

वंदना यादव जी ने स्त्री चेतना और साहित्य के संबंधों पर अत्यंत प्रभावशाली वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि साहित्य समाज के उन पक्षों को सामने लाता है जिन्हें अक्सर मुख्यधारा में स्थान नहीं मिलता। स्त्री अनुभव, संवेदनाएँ और संघर्ष साहित्य के माध्यम से ही व्यापक सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन पाते हैं। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि साहित्य परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम है, क्योंकि वह मनुष्य के भीतर संवेदना को जागृत करता है।

 

पारुल सिंह जी ने साहित्य को सांस्कृतिक निरंतरता और वैचारिक विकास का आधार बताते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में साहित्य सदैव लोकमंगल की भावना से जुड़ा रहा है। चाहे वह भक्ति साहित्य हो, आधुनिक साहित्य हो अथवा समकालीन लेखन  हर युग में साहित्य ने समाज को नई दृष्टि प्रदान की है। उन्होंने यह भी कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि साहित्य को केवल पुस्तकों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे जनजीवन से जोड़ा जाए।

 

इस पूरी परिचर्चा की सूत्रधार थीं डॉ. मेधावी जैन जी, जिन्होंने अत्यंत सहज, प्रभावपूर्ण और संतुलित ढंग से संवाद को आगे बढ़ाया। उनके संचालन ने कार्यक्रम को गंभीरता और गरिमा प्रदान की। उन्होंने वक्ताओं के विचारों को एक-दूसरे से जोड़ते हुए चर्चा को निरंतर सार्थक दिशा दी। उनके प्रश्न और टिप्पणियाँ विषय की गहराई को उद्घाटित करने वाली थीं।

 

कार्यक्रम की संकल्पना और आयोजन में किरण यादव जी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उन्होंने “धर्म फॉर लाइफ हिन्दी साहित्य” के उद्देश्य और भविष्य की योजनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह मंच साहित्य, संस्कृति और मानवीय मूल्यों को समाज के केंद्र में स्थापित करने का प्रयास करेगा। उनका मानना था कि साहित्य केवल पुस्तकालयों या अकादमिक परिसरों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि वह समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए।

 

कार्यक्रम के समापन अवसर पर रीता जैन जी, अध्यक्षा, अभिव्यक्ति, ने अत्यंत आत्मीय और प्रेरणादायी वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने “धर्म फॉर लाइफ हिन्दी साहित्य” की इस नई पहल को साहित्य और समाज के मध्य संवाद स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण प्रयास बताया। उन्होंने सभी वक्ताओं, अतिथियों, आयोजकों एवं उपस्थित साहित्यप्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि साहित्य केवल शब्दों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज की चेतना और मानवीय मूल्यों का दर्पण है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह मंच भविष्य में साहित्य, संस्कृति और सकारात्मक विचारों के प्रसार का सशक्त माध्यम बनेगा तथा नई पीढ़ी को रचनात्मक दिशा प्रदान करेगा।

 

कार्यक्रम का संचालन विशाल पाण्डेय द्वारा अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया गया। उनकी भाषा की सहजता, प्रस्तुति की गरिमा और मंच संचालन की संतुलित शैली ने कार्यक्रम को जीवंत बनाए रखा। उन्होंने वक्ताओं का परिचय अत्यंत सम्मानपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत किया तथा पूरे आयोजन में आत्मीय संवाद का वातावरण बनाए रखा।

 

इस अवसर पर माननीय देवेन्द्र बहल जी, संस्थापक  सभ्या प्रकाशन, तथा माननीय अशोक गुप्ता जी, संस्थापक  अद्विक पब्लिकेशन, की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। साहित्यिक गतिविधियों के प्रति उनके सहयोग और समर्पण के लिए आयोजकों द्वारा उनका आभार व्यक्त किया गया। साहित्य और प्रकाशन के क्षेत्र में उनका योगदान निरंतर नई प्रतिभाओं को मंच प्रदान कर रहा है।

 

कार्यक्रम में उपस्थित “अभिव्यक्ति” समूह की सभी माननीया एवं प्रिय सदस्याओं की सहभागिता ने आयोजन को और अधिक आत्मीय बना दिया। उनकी उपस्थिति इस बात का प्रमाण थी कि साहित्यिक गतिविधियाँ तभी सार्थक बनती हैं जब उनमें सामूहिक सहभागिता और संवाद की भावना हो।

 

पूरे आयोजन के दौरान एक बात बार-बार उभरकर सामने आई कि साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं है; वह मनुष्य के भीतर मानवीय मूल्यों को जागृत करने वाली शक्ति है। धर्म यदि जीवन को दिशा देता है, तो साहित्य उस दिशा को संवेदना और विचार की रोशनी प्रदान करता है। इसी कारण “साहित्य : धर्म का मर्म, चेतना और परिवर्तन” जैसा विषय आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत हुआ।

 

परिचर्चा के दौरान वक्ताओं ने इस तथ्य पर भी बल दिया कि वर्तमान समय में समाज अनेक प्रकार की वैचारिक और सांस्कृतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में साहित्य की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। साहित्य मनुष्य को भीतर से समृद्ध बनाता है, उसे प्रश्न करने की क्षमता देता है और जीवन के प्रति संवेदनशील दृष्टि विकसित करता है।


 

कार्यक्रम के अंत में यह स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता था कि “धर्म फॉर लाइफ हिन्दी साहित्य” केवल एक साहित्यिक मंच नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन के रूप में अपनी यात्रा प्रारंभ कर रहा है। यह मंच साहित्य के माध्यम से समाज में सकारात्मक चेतना, संवाद और परिवर्तन की संभावनाओं को विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है।

 

इस आयोजन ने यह सिद्ध किया कि साहित्य आज भी लोगों को जोड़ने, विचारों को जागृत करने और समाज को नई दिशा देने की क्षमता रखता है। जब संवेदनशील लोग एक साथ बैठकर विचार-विमर्श करते हैं, तब केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं होता, बल्कि नई संभावनाओं का जन्म होता है।

 

गुरुग्राम में आयोजित यह परिचर्चा उसी नई संभावना का आरंभ थी। साहित्य की मशाल के प्रकाश में ज्ञानपथ पर आगे बढ़ने की यह यात्रा अब प्रारंभ हो चुकी है। आशा है कि “टीम धर्म फॉर लाइफ” भविष्य में भी ऐसे अनेक सार्थक साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित करती रहेगी और साहित्य तथा संस्कृति के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करेगी।

 

यह आयोजन अपने उद्देश्य, विषय-वस्तु, संवाद और आत्मीय वातावरण के कारण लंबे समय तक स्मरणीय बना रहेगा। साहित्य, संस्कृति और मानवीय चेतना के प्रति समर्पित यह प्रयास निश्चित रूप से समाज में सकारात्मक बौद्धिक ऊर्जा का संचार 

करेगा।

 

---- डॉ. विशाल पाण्डेय

  प्रवक्ता, डी ए वी कॉलेज

 
 
 

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