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बदलते समय का आगाज़ - 'पुत्री भवतु' कार्यक्रम

  • Writer: medhavig4u
    medhavig4u
  • Oct 6, 2025
  • 3 min read

भारत में साधु-संतों को आध्यात्मिक मार्गदर्शकों के रूप में देखा जाता रहा है. जिनकी शरण में गृहस्थ व्यक्ति न केवल मन की शांति पाने एवं सही ज्ञान अर्जित करने हेतु जाते हैं अपितु जब जीवन में संघर्षों का चरम हो एवं कोई राह न सूझ रही हो तो लौकिक मार्गदर्शन हेतु भी जाते हैं. आज के बदलते परिप्रेक्ष्य में भी हमारे देश में अधिकतः हम विवाहित महिलाओं को अपने परिवार के वरिष्ठों द्वारा 'दूधों नहाओं, पूतों फलो' जैसे आशीर्वाद देते हुए सुनते हैं तो सोचने पर विवश हो जाते हैं कि क्या हम वाकई बदल रहे हैं एवं तरक्की की ओर अग्रसर हो रहे हैं? किन्तु मुझे यह लिखते हुए बेहद प्रसन्नता हो रही है कि हाल ही में इस प्रश्न का बेहद सुन्दर उत्तर मुझे मिला, 'पुत्री भवतु' कार्यक्रम के सुन्दर आयोजन के दौरान एवं उससे भी अधिक ख़ुशी मुझे तब अनुभव हुई जब मैंने देखा कि इस कार्यक्रम के आयोजन के प्रेरणास्त्रोत रहे आचार्य श्री वसुनंदी महाराज जी के शिष्य युगल मुनि श्री शिवानन्द जी एवं श्री प्रशमानन्द जी. इस कार्यक्रम में न केवल भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कार्यरत महिलाओं को उनकी शिक्षा एवं समाज में योगदान हेतु सम्मानित किया गया अपितु एक और जो अनूठी बात जो मुझे लगी वह थी, 'चन्दनबाला पुरस्कार' के माध्यम से गृहिणियों का सम्मान. हम सभी अवगत हैं कि महिलाओं में भी जिन्होंने शिक्षा अर्जित की एवं समाज में कुछ मुकाम पाया उनका तो परिवार में फिर कुछ स्थान व सम्मान हो जाता है किन्तु तब भी परिवार को जोड़े रखने में, सबका ख़याल रखने में, प्रति क्षण हरेक के लिए उपस्थित रहने के बावजूद जिनका योगदान पूर्णतः अनदेखा किया जाता है, वे हैं 'गृहिणियां'. मुनि श्री ने उन सभी होममेकर्स को, जिन्होंने पिछले दस वर्षों में उनके निरंतर विहार के दौरान, चौमास के दौरान एवं यहां तक कि कोरोना महामारी के विकट समय के दौरान भी हमेशा उनकी आहारचर्या का ध्यान रखा, सम्मानित किया। साथ ही उन्होंने इस बात पर ख़ासा ज़ोर दिया कि यदि गृहिणियां न हों तो घर तो नहीं ही चलेंगे, साथ ही साधु-संतों के कमण्डलों में जल तक न होगा. कार्यक्रम में अनेकों प्रस्तुतियां भी हुईं एवं प्रत्येक प्रस्तुति का मात्र एक उद्देश्य था, 'समाज में बेटियों को बराबरी का दर्जा दिलाना'.

मुझे यह सूचित करते हुए भी बेहद प्रसन्नता एवं गौरव की अनुभूति हो रही है कि मुझे भी इस कार्यक्रम में 'पॉडकास्टर' केटेगरी में सम्मानित किया गया. सेवानिवृत्त हाई कोर्ट जज श्रीमती विमला जैन, 'भारतनामा' की लेखिका श्रीमती प्रभाकिरण जैन, एवं विंग कमांडर श्रीमती नूपुर जैन, उन चुनिंदा महिलाओं में से कुछ महिलाओं के नाम हैं जिन्हें सम्मानित किया गया. 'शुभाशीर्वाद पत्र' में लिखी भाषा पढ़ मैं भाव-विभोर हुए बिना न रह सकी, जो इस प्रकार है: हे पुत्री, हमें गौरव है कि तुमने जैन कुल में जन्म लिया। तुम्हारे जन्म की खबर घबराहट भी साथ लाई थी कि इस दूषित संसार में तुम कैसे सुरक्षित रह पाओगी क्यूंकि तुम्हें आज तक निर्बल अबला के रूप में ही देखा गया था पर तुमने सबकी सोच और चिंता को बदल कर रख दिया. तुमने अपने हुनर और जज़्बे से दुनिया में हमारा सिर गौरव से ऊंचा कर दिया. तुमने वो कर दिखाया जो एक बेटा कर सकता है. तुमने अपना बराबरी का अधिकार अपने कर्त्तव्यों से पाया है. तुम्हारा धर्म परिवार, समाज, देश सब तुम्हें पाकर प्रसन्न हैं. तुमने कर दिखाया, 'बेटी अभिशाप नहीं, वरदान है, अपने माँ-बाप का अभिमान है'. आज उन लोगों के लिए तुम्हारा जीवन एक सुन्दर उत्तर है जो कहते हैं कि बेटे के बिना बुढ़ापे का सहारा कौन बनेगा? पीहर और पिया का घर रौशन करने वाली बेटी तुम सुख रहो, समृद्ध और कर्त्तव्यनिष्ठ बनो. आज तुम्हें देखकर अंतरंग से कहता हूँ, "पुत्री भवतु". अपने कामों में व्यस्त रहने के कारण मुझे इस कार्यक्रम में जाकर ही ज्ञात हुआ कि 28 सितम्बर को 'डॉटर्स डे' था. किन्तु यह देखकर बेहद प्रसन्नता हुई कि बदलते समय के साथ समाज को दिशा प्रदान करने हेतु साधु-संत भी बदल रहे हैं. आज मैं कह सकती हूँ कि यदि युवा संत 'युगल मुनि श्री शिवानन्द जी एवं श्री प्रशमानन्द जी' जैसे हों तो न केवल जैन समाज अपितु समूचे भारत वर्ष की आध्यात्मिक एवं लौकिक उन्नति निश्चित है. धन्यवाद डा मेधावी जैन संस्थापिका Dharma For Life

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