During her family life often she invests too much of herself into all the relationships, be it emotions, feelings, or physical devotion. Women spend more time at home & hence with their children & husband and all the other relationships. With time she gets more & more involved and this involvement leads to the preparation of an abstract bridge of expectation that makes her believe that they will return all the care and warmth she is manifesting in them. Whereas it happens just the opposite (at least she thinks so in her low moments) with her family members as their bridge is made up of grant, where the woman of the house is taken for granted that no matter what, she is the one who is always going to be there for each one of them; be it illness, looking after the house, finding their small things and many others. In this context, on suggestion of my dear friend Annie Singh Ji, this is my first bilingual blog where as a homemaker I am going to share my own emotions I have written from time to time. I do hope that many women will be able to relate to the lines I’ve penned down.

With passing age women tend to become even more polite for they now know that nothing is there in irritability. They deal with tantrums of the growing children with patience, also they learn to ignore the cunning behaviour.

मेरी मुस्कराहट को लोग मेरी मूर्खता समझते हैं
मेरी विनम्रता को मेरा सीधापन
मेरी मौन सहनशीलता को कायरता मानते हैं
कहते हैं, ‘यह सीधी है, इसे तो कोई भी बेवक़ूफ़ बना सकता है.’
वे नहीं मानते कि मैं मुस्कान से विपरीत वातावरण को हल्का रखने का प्रयास करती हूँ
सब कटुताएँ, चालाकियाँ समझती हूँ
किन्तु मानती हूँ कटुता वापस लौटाने से कटुता और कटु होगी
एवं सहनशीलता को मैं निर्भयता कहती हूँ
मैं सीधी नहीं, जीवन के प्रति समर्पित हूँ
जानती हूँ कि धोखा केवल स्वयं को दिया जा सकता है.

At this point of life she analyses even closest of her relationships:

जीवन के कई पड़ावों पर आभास होता है कि भाई-बहन केवल अपने प्रेम द्वारा, आपस में इस रिश्ते को मिलकर खींच लेंगे. किन्तु कभी शीघ्र तो कभी कुछ समय पश्चात् उन्हें यह अहसास होता ही है कि उनका रिश्ता माता-पिता से होकर जुड़ा है. बिना माता-पिता के रिश्तों का औचित्य बहुत तेज़ी से घटता है.
और तब हम चिंतन करते हैं, ‘जब सब रिश्ते अंत में बेकार ही साबित होने हैं तो आख़िर व्यक्ति रिश्तों में पड़ता ही क्यों है?’

When her children leave her to move ahead with their lives she tries to keep herself busy:

वह उदास सी अन्तस् के दरवाज़े से गुज़र रही थी
अन्तस् औज़ार लेकर तोड़-फोड़ में लगा था
उसने पूछा, ‘क्या कर रहे हो?’
अन्तस् ने कहा, ‘दोनों बच्चे बड़े हो अपनी उड़ानों में व्यस्त हो रहे हैं ना! तुम व्यस्त रहो सो मैं तुम्हारे लिए एक नया पथ तैयार कर रहा हूँ.’
वह आँखों में आँसूँ भर मुस्करा दी.

She puts her energy into deep contemplation about all the relationships and silently tries to prepare herself for any adversity:

जिन रिश्तों का मैं ताउम्र दंभ भरता हूँ
कोई साथ नहीं जाता, अकेले ही मरता हूँ
और तब सोचा करता हूँ
स्वयं को इस काबिल बनाना है
कि यात्रा अकेले ही तय कर सकूँ
साथ में सब हों तो उम्दा
अन्यथा किसी से कोई शिकायत न करूँ

When my son completed his 12th and he decided to go abroad for his further studies, you won’t believe I was in a dilemma because this was the start of a new phase not only for him but also for me. As it was the end of his dependency on me for his tiny things. Then being a writer, to get rid of this phase, I wrote this poem:

जब तुम अपनी छोटी-छोटी चीज़ों को ढूँढ़ने के लिए मुझ पर निर्भरता जताते हो
तब चिक-चिक करती मैं आकर झट से वह ढूँढ़ देती हूँ
तब भीतर से मैं कितनी ख़ुश होती हूँ
तुम नहीं समझोगे…

तुम्हारा बड़ा होना, आगे बढ़ना बेशक सुकून देता है
किन्तु उसके एवज़ में जब मेरा बच्चा मुझसे दूर होता है
यह कितना कष्टकर होता है
तुम नहीं समझोगे…

अब विद्यालय का प्रांगण छोड़
तुम विश्वविद्यालय जाने की तैयारी में हो
स्कूल के लिए प्रतिदिन मेरा तुम्हें जगाना
किस क़दर मेरी दिनचर्या का हिस्सा था
तुम नहीं समझोगे…

तुम उत्सुक हो, बेपरवाह
जीवन से भरा लबालब प्याला पूरा पीने को
ज़िन्दगी को आग़ोश में लेने को
मैं ख़ुश हूँ बहुत
चाहती हूँ तुम जीवन पूर्णतः जियो
इस क़दर कि कुछ बच न रहे
किन्तु तुम्हें यूँ जाने देना
जो करो, करने देना
बस यूँ ही क्यों मुझे भावुक किए देता है
तुम नहीं समझोगे…

यूँ तो मेरा और तुम्हारी दीदी का प्रेम जगजाहिर है
किन्तु फिर भी मेरी चेतना के केंद्र में तुम क्यों हो
तुम नहीं समझोगे…

Then a woman silently asks this question to the society:

नया रिश्ता आरम्भ होने पर मोह-बंधन तो सब सिखाते हैं
किन्तु उसमें भिन्न मोड़ आने पर स्वयं को कैसे संभालें
यह कोई नहीं सिखाता

Kids move on with their lives they are the parents who find it the most difficult to live without them for the home seems no more the same; that used to be filled with their youthful energy, music, friends, eatings all the time. They have to make themselves understand that:

जिस प्रकार माता-पिता के लिए बच्चे सब कुछ हो सकते हैं, ज्ञात रहे उस प्रकार बच्चों के लिए माता-पिता सब कुछ नहीं हो सकते. और यदि होते भी हैं तो इससे उनके अन्य रिश्तों के पनपने में अभाव रहता है. वैसे भी झरना चाहे जल का हो या प्रेम का, सदा ऊपर से नीचे की ओर ही बहता है चूंकि यही नियम है, यही उत्तम है.

In her low moments often the woman ponders in her silent time:

बच्चे बाहर से घर लौटें तो माँ दिखनी चाहिए, घर पर मिलनी चाहिए
पिता शाम को थके हारे दफ्तर से घर लौटें
तो माँ का मुस्कराता चेहरा स्वागत में तत्पर मिलना चाहिए
किन्तु माँ सबसे अधिक स्वार्थी हैं
माँ अकेले रहने से घबरातीं हैं
माँ को हर समय, सब चाहिएँ.

Then finally as a strong woman she analyses if she can be a pillar to all of them why can’t for herself? And as always she finds a solution and move on with peace:

जीवन के इस दोराहे पर कुछ रिक्तता सी उभरी है
इसे उदास रहकर भरूँ या रचनात्मक होकर
तरज़ीह मेरी है

As a form of the Shakti, she motivates herself as:

हाँ, तुम कर सकती हो
वर्षों से तुमने केवल समर्पण सीखा है
हर रिश्ते, हर परिस्थिति में खुद को अर्पण करना सीखा है.

अपनी चेतना को तुमने सदैव औरों में ढूँढा है
तुम्हारे त्याग को सबने स्वीकृत करना सीखा है.

अब वक्त है, अपनी चेतना को निज में समेटने का
स्वयं की संतुष्टि के लिए कुछ करने का.

अब समय है, अपने पंखों को इस्तेमाल करने का
गगन में निर्भय हो ऊँची उड़ान भरने का.

हाँ, तुम कर सकती हो
तुम घर और बाहर एक साथ
समान सुगमता व विनम्रता से संभाल सकती हो
चूँकि तुम और कोई नहीं, स्वयं शक्ति हो.

With this friends I wish all the women all the very best with their lives & its struggles. I believe a woman fights with herself at many fronts. Do read my poetry on these ‘A Poem Dedicated To Indian Housewives’ and ‘Poetry On Women Facing 40th Year Of Their Lives’

Love & Peace
Medhavi 🙂

If you enjoyed this article, Get email updates (It’s Free)

The following two tabs change content below.

Medhavi Jain

As a writer & a Life Coach, I am determined to make a positive change in people's lives.